मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

चाँद के उजाले में, आँसू के गीत लिखता है ।


हर तावनाक चेहरा, कालिख छिपाये रखता है ।
अन्दर से और कुछ है, बाहर से और दिखता है ।

पसीने की तो दोस्तो, तुम बात छोड़ दीजिए,
खून भी इस शहर में, पानी के भाव बिकता है ।

ये झिलमिलाती बिजलियाँ, महदूद कोठियों तक,
इस जहां की शराफत का, सच सच वयान करता है ।

भूखौं के सामने अक्सर, रोटी की बात करते है,
एक एक वोट कितनी, मेहनत के बाद मिलता है ।

इतराते हुऐ हर फूल को, तुम गौर से देखो जरा,
किसी बीज की ही लास पर, फूल-ए-गुलाब खिलता है ।

एक आदमजात महफिल में, हँसता है बहुत जोर से,
चाँद के उजाले में, आँसू के गीत लिखता है ।
              
                     ---- -मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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