गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

तकब्बुर है शहर वालों को,खुद के शऊर पर (गज़ल)



माना कि तेरे शहर का,मौसम नया तो है।
मयस्सर हमारे गाँव में ,ताजा हवा जो है।

तकब्बुर है शहर वालों को,खुद के शऊर पर,
मुतमईन हूँ मैं गांव में, शर्म-ओ-हया तो है ।

हालांकि मेरी पहुँच से, वो दूर है  मगर ,
उस आसमां से कह दो, मेरा हौसला जो है।

वो चल चुके पटाखे, और बुझ चुके दिये ,
पाकर किसी गरीब का, बच्चा हँसा तो है।

अपने स्वार्थों के साँचों में,खुदाओं को ढालकर,
करता गुनाह आदमी , लाँछन खुदा  को है ।

इन्सानियत की मौत पर,कोई आँख तक न गीली हो,
'मोहन'नये जमाने  को, कुछ  हो  गया  तो  है ।

कभी शब्द रो दिए, तो कभी रो गईं मेरी आँखें,
ग़म और मेरे दरम्यां, कुछ सिलसिला तो है



                               -----मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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