शनिवार, 16 अप्रैल 2016

अरे!अब तो मत छिपाओ, उजले कफन से ढक कर (गजल)

किस गम के गीत गाऐं ,किसको वयाँ करें।
शिकवों का जाम आखिर ,कब तक पिया करें।।

ये है यकीं कि खाक से ,मोती  नहीं निकलते,
पर खाक भी न छानें, तो करें भी तो क्या करें।

हमको हुआ मयस्सर , जीवन कबाड़खाना,
मैदान में रहते है , तूफाँ से  क्या  डरें ।

महफूज कर लिया है, मैंने प्रत्येक पत्थर,
हर फूल के बदले में पाया है, क्या   करें  ।।

खुदगर्ज है जमाना, खुदगर्ज दोस्ताना ,
खुद्दार जिंदगी है , 'मोहन'  की  क्या करें। ।

अरे!अब तो मत छिपाओ, उजले कफन से ढक कर
निशानों को कहने दो  , वे जो  कुछ वयाँ  करें।।




               .    ------मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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