गुरुवार, 3 जनवरी 2019

टुकड़ों की जिंदगी कभी , मुकम्मल न हो सकी,



मैं भीड़ में भी हूँ, और तन्हाइयाँ भी है ।

आसान नहीं जिंदगी, कठिनाइयाँ भी है ।


यादों की शाम सजाकर , बैठा मैं चाँद पर,

बादल घिरे अतीत के, पुरवाइयाँ भी है ।



जमाने की चकाचौंध, दिखावे है रोशनी के,

जितनी चमक  गहरी ,घनी परछाइयाँ भी है ।


दुनियाँ की नजर में फकत, मुस्कान मेरी आ सकी,

अंदर  दबे  है  दर्द  , और  रुसवाइयाँ  भी  है ।


टुकड़ों की जिंदगी कभी , मुकम्मल न हो सकी,

दरारें ही नहीं , जख्मों की गहरी ,खाइयाँ भी है ।


इनको महज पिछड़ी पुरानी, बात कह खारिज न कर,

मजहबी   बातों  में  कुछ  ,  अच्छाइयाँ  भी  है  ।


हम आँखों से नाप लेते है, निगाहों के फासले,

मासूमियत   के  रंग  में ,  चतुराइयाँ  भी  है ।

                    


                        ©---मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'

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