शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अन्दाज-ए-वफा सूरत से, हरगिज़ न लगाया जाये।





जिंदा लोगों को ,न फिर से, लाशों मे सुमारा जाये।
ऐ खुदा खैर करो ,  वो लम्हा  न  दुवारा आये।।

जलाए है आशियाने , दो पल के उजाले ने,
मेरे  अंधेरों में कोई दीपक, फिर से न जलाया जाये।

आँखें वयान करती है , दासता -ए-मुकद्दर,
आँसू पर किसी हँसी को, बाजिव न बताया जाये।

अब तो जिंदगी का मकसद, मतलब परस्तियां है
अन्दाज-ए-वफा सूरत से, हरगिज़ न लगाया जाये।

इन गीतों में सिर्फ मेरी ,हकीकत ही वयां होगी,
इल्जाम कोई फिर से, झूठा न लगाया जाये।

सफ्फाक सितमगरों को ,सर-ए-आम सजा देदो,
'मोहन' किसी को फिर से, सायर न बनाया जाये 
     

                              ----मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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