बुधवार, 11 जनवरी 2017

ले चलो मुझे इस फनाह संसार से।

ले चलो मुझे इस फनाह  संसार से।
सिंधु के उस पार को, इस पार से।।

कलियाँ बनकर पुष्प, आखिर झड़ रही,
वक्त की इस बेरहम, तलवार से ।।

हूँ   तड़प   उठता ,  अकेले  में  कभी,
क्या मिलेगा जिंदगी के , सार से।।

यूँ तो काफी लोग मुझको, जानते
खुद ही हूँ अनभिज्ञ मैं , पहचान से,

करते है हमदर्द, जख्मों की दवा
मरहम देते है, नोक-ए-तलवार से।।

सुन तो रक्खा है ,मगर अब देखना,
हँस के जाते सब तेरे, दरबार से ।

'मोहन' तेरी भी, गुजर होगी नहीं,
दरबाजे को खोज, हट दीवार से।।

         ------✒© मनीष प्रताप सिंह
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