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सोमवार, 21 मार्च 2016

मिरे खेतों को पानी का ,भरोसा दे गया बादल,

वो नंगे पांव कांटों पर ,मेरा हँसकर गुजर जाना।
राह में ठोकरें खाकर के ,गिरना और सम्हल जाना।

मेरी आँखों से कागज पर,महज टपका था इक आँसू,
नहीं मालूम है मुझको, गज़ल गीतों का बन जाना।

हसीं सपने जो आँखों में ,वो तुमने ही दिखाये थे,
महज़ वोटों की खातिर था,तुम्हारा रंग बदल जाना।

किन्हीं मजबूर आँखों में ,उजाला भर सके तो सुन,
नहीं तुझको जरूरी अब,कहीं मंदिर तलक जाना।

मिरे खेतों को पानी का ,भरोसा दे गया बादल,
किसानों की यही किस्मत, वो बारिश का मुकर जाना।

यकीनन ये शरारत भी, तो पतझड़ की रही होगी,
मेरी उम्मीद की कलियों को, चुपके से कुतर जाना।

हमारी  आँख  में  आँसू , उदासी गर  नहीं  होते,
तो मुमकिन ही नहीं 'मोहन',गज़ल गीतों का ढल पाना।



                    -----मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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शुक्रवार, 18 मार्च 2016

न आयेगी .....

एक दिन मैं बैठा आँगन में
दीवारों के उस पार 
क्षितिज को देख
कुछ विचार कर रहा था मन में
तभी अचानक एक चिड़िया आयी
फुदकती गाना गाती
कूड़े में से कुरेद कर कुछ खाती
फिर एक चिड़िया और आयी
एक और आयी
कुछ और आयीं
कुरेद कर कूड़ा वे खाने लगी
मुझे उनका आना अच्छा लगा
और उनपर दया भी आयी
मैंने मुट्ठी भर दाने बिखरा दिये आँगन में
सोचा कि अब जब भी कोई चिड़िया आयेगी
तो कूड़े के बजाय स्वच्छ दाने खायेगी
लेकिन मुझे क्या पता था दोस्तो
दाना डालने के बाद एक चिड़िया भी न आयेगी....


                             ------मनीष प्रताप  सिंह 'मोहन'
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