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मंगलवार, 27 जून 2017
किसी के बाप का कर्जा किसानों पर नहीं बाकी,
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किसां जो रोटियां देता, जमाने भर को खाने की। उसी के अन्न पर पलकर, करो बातें जमाने की। किसी के बाप का कर्जा किसानों पर नहीं बाकी, तुम्हार...
गुरुवार, 28 अप्रैल 2016
बन्द कमरे में अकेला, और मैं करता भी क्या,
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दोस्तों के इस जहां में,दोस्ती ढूँढें कहाँ, दोस्त जैसे है बहुत , पर दोस्त भी मिलता नहीं। कारवां से दूर हो ,तन्हा रहा मैं इन दिनों, वक्त ...
रविवार, 10 अप्रैल 2016
जो सबका 'अन्नदाता' है, जहर खाते हुये देखा।
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मैंने खेतों में उम्मीदों को, पल जाते हुये देखा। उन्हीं खेतों में उम्मीदों को, जल जाते हुये देखा। वो ढलती शाम में खेतों की, मेंढों पर टहल...
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